शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

रोटी या रश्‍दी : जब्बार ढांकवाला

मैं कहता हूँ रोटी
वे कहते हैं रश्दी
मैं कहता हूँ रोज़ी का क्या होगा
वे पूछते हैं
भाषा कौन सी रहेगी
मैं कहता हूँ
तालीम बढ़ाओ
वे मांगते हैं
मदरसे की तामीर का चंदा
मैं कहता हूँ
सुनो वक़्त की आवाज़
मैं समझाता हूँ
कीचड़ से कीचड़ को
नहीं धो पाओगे
वे फरमाते
ईट का जवाब
पत्थर से नहीं देंगे
तो मिट जायेंगे
मैं कहता हूँ
जुडो अपनी ज़मीन से
वे बताते  हैं
दुनिया में फैली
बिरादरी की दास्तान
मैं कहता हूँ
आओ बहस करें
कहाँ जाना है
कैसे जाना है
वे हुक्मनामा थमाते हैं
सब कुछ तय हो चुका है
कई सदियों पहले
मैं आगे कुछ बोलूं
इससे पहले
वे उठाते हैं ढेले
जो जमा किये गए थे
संभावित आक्रान्ताओं के ख़िलाफ़
सर से पाँव तक
टीले उभर आये हैं
मेरे जिस्म पर
और वे खुश हैं कि
जंग जीत ली है उन्होंने

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